milap singh

milap singh

Monday, 23 September 2013

आँखों से बार- बार

काजल से काले पलकों के
किनारे न किया करो

सुर्खी से लाल हौंठ  
ओर अंगारे न किया करो

मर जायेगा ' मिलाप '
कभी दिल पे हाथ रख के

तुम आँखों से बार- बार 
इशारे न किया करो


.........मिलाप सिंह भरमौरी 

Wednesday, 18 September 2013

बू -आती है इमान सड़ने की

बाहर  बातें करते है 
व्यवस्था को ठीक करने की
अंदर मिलकर  तकरीबें  सोचते है 
झौली  भरने की
कितना ढक  कर  रखें ' मिलाप '
नाक  अपना  हम 
यहाँ तो जगह -जगह पर
बू -आती  है इमान  सड़ने की


एक शेर और पेश कर  रहा हूँ ….


जो खुद करते है दगा रोज अपने रिचक  से
वो कहते है कि   इन्कलाब लाएँगे  ज़माने में

रिच्क का अर्थ ....... रोजी -रोटी का साधन 


एक और शेर प्लीज........


उसने अहद कऱ  लिया है 
इमां पर चलने का
क्या वो भी ' मिलाप '
हादसे में मारा  जायेगा


......मिलाप सिंह भरमौरी

Thursday, 18 July 2013

हसरतें मर गई

हसरतें मर गई जिन्दगी रह गई
मन्दिरों में भटकती वन्दगी रह गई

हुस्न की जमाने में कद्र न हुई
फैशनपरस्ती में दवी सादगी  रह गई

किस तरह हुआ गजल से प्यार
बात दिल में 'मिलाप' राज की रह गई

गोशे -गोशे से जमाने ने लुटा मुझे 
नतीजा हिस्से में मेरे शायरी रह गई


........मिलाप सिंह भरमौरी 

Wednesday, 17 July 2013

वो इस तरह बिछड़ा

वो इस तरह बिछड़ा के मुझे खाली कर गया
मेरी अरमानों भरी दुनिया को पानी  कर गया

वक्त कितना बेरहम निकला के पलक झपकते ही
मेरी जिन्दगी की हकीकत को कहानी कर गया

एक लफ्ज वक्त-ए- रुखसत खुदा तुझपे भरोसा नही
सवाब उम्रभर के मेरे को बेमानी कर गया

तमाम  उम्र में कुछ न कुछ खोता ही रहा
मेरा मुक्कदर मुझ गरीब को दानी कर गया

यह अंजाम हुआ मेरी बफा का इक मजबूरी से
के मेरा मेह्बूव मुझे बेबफा के सानी कर गया

.........मिलाप सिंह भरमौरी 

Tuesday, 16 July 2013

दे गया दर्दे जिगर


कर रहा जख्म हरा हर लम्हा -लम्हा
दे गया दर्दे जिगर प्यार पहला-पहला

यादों में समाया है 'मिलाप' जमाना सारा 
बीत रही जिन्दगी मगर तन्हा- तन्हा 

हाथों में उसके लहू था या के मेंहदी थी
रंग तो था उसका  कुछ गहरा-गहरा 

दर्द की  इन्तहा होने वाली है शायद
लग रहा है समा अब ये सहमा- सहमा 

........मिलाप सिंह भरमौरी 

Monday, 15 July 2013

ये तेरी नजर भी

ये तेरी नजर भी कमाल करती है
मेरी रुकी सांसों में जान भरती है

कोई तलवार है न कोई खंजर
फिर भी ये काम तमाम करती है

देखने वाला लड़खड़ाए शराबी जैसा
न जाने कैसी ये चाल चलती है

अब जरूरत नही मैखाने जाने की
तेरी नजरों से मेरी जाम भरती है

जो ये  उठती है इतनी हमदर्दी से
शायद मोहावत का पयाम करती है

इसको समझने की कोशिस कर तू
ये कुछ न कुछ तो व्यान करती है



.....मिलाप सिंह भरमौरी

Friday, 12 July 2013

अदा-ए-हँसी

असर ऐसा हुआ है
अदा-ए-हँसी का 
के कारवां चल पड़ा है
साथ ख़ुशी का

जैसा चाहा था वैसा 
हमसफर दिया है
शुक्र कैसे करूं 
अदा मै नवी का

है सबसे जुदा 
वो मेह्बूव मेरा 
जैसे हिस्सा न हो
वो इस जमीं का 

वयां क्या करूं 
मै त्वसुम उसका
जैसे खिला हो गुल
अभी के अभी का 

असर ऐसा हुआ है
अदा-ए-हँसी का 
के कारवां चल पड़ा है
साथ ख़ुशी का



.....मिलाप सिंह भरमौरी