milap singh

milap singh

Monday, 24 December 2012

बरहम से खाव मेरे



बरहम से खाव मेरे


बरहम से खाव मेरे फिर से जुड़ने लगे
आकर के गम के झौंके वापिस मुड़ने लगे

पहाड़ों की हसीन बारिश रिमझिम फुहार -सी
शवनम के जैसे कतरे दिल पे गिरने लगे

गम का जिक्र करते पहुंचा मै कहाँ पे
बादल मस्त फलक से जमीन पर उतरने लगे

भंवरों को देख के कलियाँ निखार पाए
इस मस्त मौसम में फूल दिल में खिलने लगे

पहाड़ों की कोई रानी बर्क -सा लिए तव्सुम
ऐसा लगे जैसे 'अक्स' पे हंसने लगे


मिलाप सिंह

Wednesday, 19 December 2012

ye ! jindgi mere khav





ऐ ! जिन्दगी मेरे खाब तू यूँ फना न कर
बेवक्त दगा न दे मुझे  तू गुनाह न कर

हर शय़ से आजतक मैने की है ईमानदारी
मै भी करूंगा बेबफाई तू गुमान न कर

लुत्फ़ उठाने दे जरा दुनिया की रंगीनियों का
कर न तकरार मुझसे खराब समां न कर

किससे की है तूने आजतक बफा बता
जज्बात दिल के मेरे फिर से जबां न कर

जरुर मिलेगी मंजिल 'अक्स ' जहाँ में कभी
उम्मीद बेशक धुंदली ही पर धुआं न कर


मिलाप सिंह  

Monday, 17 December 2012

फिर भी तुमसे मोहबत है




फिर भी तुमसे मोहबत है 
तोड़ दे दिल मेरा इजाजत है

तुज्को मैने दिल से चाहा है
बस यही मेरी हकीकत है

बेबफा हो तुम तो भी क्या
मुझको को तो बफा की आदत है

महंगा पड़ जायेगा नजर मिलाना भी
कहने को तो फक्त शरार्त है 

काम आएगा अब मयखाना ही
जहाँ रोज 'मिलाप' कयामत है

संभल के चल इश्क की राह पे
इसमें सपनों सी नजाकत है


मिलाप सिंह 

dil ko mere

Friday, 14 December 2012

jajbat rokte - rikte

                        जज्बात  रोकते  - रोकते 



एक मुद्दत  हुई  जज्बात  रोकते  - रोकते 
रह  न  जाये  कहीं  युहीं  सोचते  - सोचते 

मैं बुजदिल  नही  सब  कह सकता  हु  मगर 
रुक  जाती  है  जुबान मेरी  बोलते  - बोलते 

बोल  दे  जो  बोलना  है  वक्त  के  रहते  तू 
टूट जाये  न खाब  कही जोड़ते  -जोड़ते 

कोई  भी  काम  ' अक्स  ' इतना  आसन  नही 
जोर  तो लगता है  हवा  को मोड़ते  - मोड़ते

वक्त  तो  वेहरा  है  फिर  कहाँ सुनता  है 
गांठ  ही न पड़  जाये उलझन  खोलते  - खोलते



मिलाप सिंह 

Thursday, 13 December 2012

आप आएँ तो


आप आएँ तो

आप आएँ तो हवाओं में लहर होती है
घटा बरसती है धरती पे महर होती है

कितनी मौजों को मेरे संग कर देते है
फीकी तस्वीर में प्य्रारे रंग भर देते है
आपके बिन तो जिन्दगी अधूरी लगती है

दुनिया में बस अँधेरा ही अँधेरा है
दिखता तो कुछ नही कहने को सबेरा है
आप आए तो मेरी भी सहर होती है

फूल- पत्ते ,कलियाँ सब खिल जाती है
खोई हुई खुशिया सब मिल जाती है
देखने वाली 'अक्स' ये सहर होती है


मिलाप सिंह