milap singh

milap singh

Thursday, 11 April 2013

न मचल मेरे िदल

न मचल मेरे िदल न मचल
ये है खाबों का तेरे महल
खाव टूटेगा जाएगा िबखर
कोई उडता है क्या पँखो के िबन
कोई जीता है क्या सांसो के िबन
मान हकीकत तू थाम ले जीगर
न मचल मेरे .....

.....milap singh bharmouri

Wednesday, 10 April 2013

खूदा का नाम

िकसको दूर करूं
िकसको नजदीक करूं
जो बस में ही नहीं है
उसे कैसे ठीक करूं
ओर चारा ही नहीं हैं
ओर गूजारा ही नहीं
बस खूदा का नाम लूं
मैं और चुपचाप रहूं

.....milap singh bharmouri

दहर-ए-शरीकी

उजाले की दोस्ती है
अनजान है तारीकी में
यहाँ तक ही पहूंच पाया
सोचा जब भी बारीकी में
इक तू ही साथ है बस
मूझे तेरी ही आस  है
यूं तो िकतने ही लोग है
इस दहर-ए-शऱीकी में

.....milap singh bharmouri

Tuesday, 9 April 2013

भ्रष्टाचार के खिलाफ


ये ईंटें नही फक्त
इनमे तारिख की 
निशानी है
इनमे हैवानों की 
हैवानियत है
और देशभक्तों की जवानी है
जरा गौर से देखो इन निशानों को 
गोलियां सहती लाशों और दीवारों को
देशभक्ति की ये प्रथा 
भ्रष्टाचार के खिलाफ 
आज भी हमको निभानी है


....milap singh bharmouri

Monday, 8 April 2013

मिटती क्यों नही गरीबी


अगर नामुमकिन नही है कुछ भी
इस जहान में 
तो मिटती क्यों नही गरीबी मेरे
हिंदुस्तान से 

इन झुगियों से जैसे कोई वास्ता नही है
इस चश्मे - पुरआव की कोई दास्ताँ नही है
बस निकल लेते है काफिले इधर से 
अनजान से 

नेमते -खुल्द -में वो जिए जा रहे है
सियासतों पे सियासत किए जा रहे है
देखें तो इक झलक इधर भी वो
सब्र - -ताव से 




....milap singh bharmouri


चश्मेपुरआव -- आंसुओं से भरी आँख , नेमते –खुल्द -- स्वर्ग जैसा सुख , सब्र - –ताव -- सहास से




Sunday, 31 March 2013

समान अवसर नही था


वो कहता है
मेरा बच्चा काबिल था
कामयाबी पा गया है 
मै कहता हूँ खुशनसीब था 
मौके का फायदा उठा गया है

जब उसका बच्चा 
आखर ज्ञान सीख रहा था 
मेरा बच्चा
दुनिया की नजरें पढ़ रहा था
कटोरे में भीख मांग रहा था

जब वह मौसम से बेखबर
बंद कमरे में सो रहा था
तब मेरा बच्चा 
झुग्गी में 
सर्दी -गर्मी , तूफान -ओले से
बाकिफ हो रहा था

जब तेरा बच्चा 
रोज-रोज महंगे -महंगे 
खिलौने मांगता था
तब मेरा बच्चा 
कूड़े के ढेर में 
कोई खजाना खोजता था

अरे ! तू बोलता है
यहाँ अवसर की समानता है
तू क्यों झूठ पे झूठ बोलता है
मेरा बच्चा तो स्कुल जा ही न सका
और तूने माया के बल से लिया पढ़ा 

फिर ये कैसी समानता है
समझ नही आता ये कैसी अज्ञानता है
मुझे यकीन है मेरा बच्चा तेरे बच्चे से 
कहीं ज्यादा चतुर था 
पर अफ़सोस ! 
दोनों के लिए 
जिन्दगी का 
समान अवसर नही था 




मिलाप सिंह भरमौरी

Saturday, 30 March 2013

या मै अनपढ़ हूँ


या मै  अनपढ़ हूँ 
इसलिए मुझे बात समझ नही आती 
या वो बडबोला है 
बस वह बोलने का ही है  आदि

वो कहता है यहाँ पर 
हर आदमी समान है
मै कहता हूँ के वह 
इस दुनिया से ही अनजान है

या वो अनजान है
या अनजानेपन का ढोंग करता है
या मानसिकता कलुषित है
या उसके मन में
कोई रोग पलता है

क्या वो अँधा है 
रोज उसे अपने महल से निकलते
रास्ते में मेरी झुग्गी दिखाई नही देती
क्या वो बहरा है 
उसे मेरे भूखे बच्चे की
रोने की आवाज सुनाई नही देती 

वो अक्क्सर कहता है
कभी अखवारों में 
कभी टी. वी. पे 
कभी भूखों की भीड़ में
इन्ही बाजारों में
कि यहाँ पर सब इन्सान बराबर है



मिलाप सिंह भरमौरी