इश्क के आगे हर रंग फीका लगता है।
हारकर भी सब कुछ जीता सा लगता है।
कुछ फर्क नहीं पडता अब तेरे दिए हुए जख्मों से,,
तेरा दिया दर्द भी अब मीठा सा लगता है।
............ मिलाप सिंह भरमौरी
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इश्क के आगे हर रंग फीका लगता है।
हारकर भी सब कुछ जीता सा लगता है।
कुछ फर्क नहीं पडता अब तेरे दिए हुए जख्मों से,,
तेरा दिया दर्द भी अब मीठा सा लगता है।
............ मिलाप सिंह भरमौरी
कब तलक आखिर
यूंही लडखडाया जाए
क्यों न इक कदम
तेरी ओर बढाया जाए
बहुत सुनते आए हैं
इक नाम मुकद्दर का
क्यों न आज इसे भी
आजमाया जाए
-- मिलाप सिंह भरमौरी
सब उसकी बिछाई बिसात है
कोई समझता है सब उसके हाथ है
हर हरकत पे है पूरी उसकी कमान
उसकी मर्जी से बनती हर बात है
मालिक है वो इस सारे जहाँ का
हर इंसान जर्रा उसका दास है
पल का नहीं है पर कोई भरोसा
बेशक चल रही अभी पूरी सांस है
------ मिलाप सिंह भरमौरी
तेरी यादें मुझसे कुछ कहती हैं
तू अभी भी मेरे दिल में रहती है
वो जमाना फिर उमड के आता है
तू आंखों से फिर कुछ कहती है
------ मिलाप सिंह भरमौरी
गर्व है कि हमको कि हम हिन्दोस्तानी है
अमनो -चैन- इमान यहां की निशानी है
प्यार से रहते हैं यहाँ मिलजुल कर सब
वरना अब भी दुनिया इससे अनजानी है
---------- मिलाप सिंह भरमौरी
Hindi shayari
☆☆☆☆☆☆☆
यह तो सच है कि मोहब्बत में
कोई मजहब या जात नहीं होती
यह तो उन्मुक्त पतंग है
जिसकी डोरी किसी के हाथ नहीं होती
पर पहले मोहब्बत फिर शादी और
फिर जबरन धर्म को बदल देना
लव जेहाद नहीं तो ओर क्या है यह
पाक दिल में तो ऐसी कोई बात नहीं होती
------ मिलाप सिंह भरमौरी
जब दौलत का नशा सिर चढ जाता है
फिर भाई का दुश्मन भाई बन जाता है
रोज होती है कोर्ट -कचहरी की बातें
रोज किस्सा दो गज का बन जाता है
फिर भूल जाते हैं सब आगे पीछे का
बस बदले के लिए मन ठन जाता है
क्यों भूल जाते हैं इंसानियत को इंसान
ये दौलत का खजाना कब संग जाता है
---------- मिलाप सिंह भरमौरी
गलती तो तिनके की है
जो खुद को पर वाला समझता है
वरना उसको तो उडाने में
सब जोर तुफान का लगता है
आखिर जी भर जाता है
तुफान का खेल के कुछ पल
और नासमझ तिनका फिर
औंधे मुंह जमीन पे गिरता है
------ मिलाप सिंह भरमौरी
हो रहा गांव मोहल्ले में
रामायण का मंचन
लहरा रहा धरा पर
भगवा हिन्दू धर्म का परचम
नवरात्रो की हो हार्दिक
बधाई सभी को
यूहीं उजाला फैलाता रहे
अपना हिन्दू दर्शन
---- मिलाप सिंह भरमौरी
दो दिन क्या दूर रहे
ख्याल बदल गए हैं
सिर की लम्बी चोटी के
बाल बदल गए हैं
अभी अभी आया हूँ
और जाने को पूछते हैं
हैरान हूँ कि यार के
सबाल बदल गए हैं
----- मिलाप सिंह भरमौरी
सदमा तेरी जुदाई का
न हमसे सहा जाएगा
बिछुड कर एक पल भी
न हमसे रहा जाएगा
देख तू भूल कर भी
बिछुडने की न सोचना
क्योंकि लफ्ज पानी भी
न हमसे कहा जाएगा
------ मिलाप सिंह भरमौरी
मत बन दुनिया तू अनजान
भारत देश है सबसे महान
जगह जगह गाड रहा तिरंगा
चंद्र हो या मंगल अभियान
गंगा यमुना है तहजीब हमारी
सर्व धर्म है भारत के प्राण
इक मानवता ही तो है मूल धर्म
बांट रहा है यह सबको ज्ञान
----- मिलाप सिंह भरमौरी
तेरे प्यार की सौगात
रुसवाई ही सही
मुझे महफिल न मिली
तन्हाई ही सही
चलो ऐसा तो नहीं
के कोई ताल्लुक ही न था
तुझसे कुछ तो मिला
बेबफाई ही सही
----- मिलाप सिंह भरमौरी
जोश हो प्रगति के लिए
हथियारों के मुंह खामोश रहे
मानवता की भलाई के लिए
बस कारीगरों के औजार चले
नफरत के बीज न पनप सके
हर मजहब के लिए प्यार पले
विश्व शांति दिवस की आज
सब लोग बधाई स्वीकार करें
------- मिलाप सिंह भरमौरी
दिल की गहराई में कोई
उतरता ही नहीं है
मैं जिसको चाहूँ
मेरा बनता ही नहीं है
मैं कहता हूँ
बदल जा जमाने के साथ
दिल है मेरा कि
बदलता ही नहीं है
- - - - - मिलाप सिंह भरमौरी
सुनने वाला अचानक ही
इक झटका सा खा जाता है
जब चली हुई किसी बात में
जिक्र तुम्हारा आ जाता है
वैसे भी कब बस चलता है
जब मन से दिल हट करता है
फिर चढते चढते नशा तुम्हारा
जिस्मो जां तक छा जाता है
---- मिलाप सिंह भरमौरी
जब भी पडोसी की रसोई से
लजीज सी खुशबू आती है
अकेलेपन की यह जिंदगी
ओर भी बोझिल हो जाती है
दिल में आता है कि अब
तोड दूं सब अकेलेपन के बंधन
उसको साथ ले आने की
तमन्ना सी हो जाती है
------- मिलाप सिंह भरमौरी
मैं हर पल सोचता रहता हूँ
तेरे बारे में
क्या तेरे दिल में भी
मेरे लिए कुछ ख्याल आता है
मैं कौन हूँ क्या लगता हूँ तेरा
इस तरह का कभी मन में
सवाल आता है
मैं तो बस तुमको ही पाता हूँ
चाहे जिधर भी नजर उठा लूं
क्या तेरी धडकनो में भी
मुझे देखकर कुछ उछाल आता है
---- मिलाप सिंह भरमौरी
कश्मीर के लोग अब
अपनी इस फौज के दिवाने हो रहे हैं
यह देख के चंद लोगों के
मुंह काले हो रहे हैं
रुकावट डाल रहे हैं वो
राहत के पाक कामों में
डर गए हैं वो देख के
घाटी में तो अमन के उजाले हो रहे हैं
------- मिलाप सिंह भरमौरी
प्यार दूर रहने से
ओर भी बढ जाता है
हर घडी साथ रहे तो
सिर खाता है
जान निकल जाती है फिर
चढने और उतरने में
दूर से तो पर्वत
सबको खूब भाता है
---- मिलाप सिंह भरमौरी